देशभर की गौशालाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है उनका खर्च चलाना। चारा, दवा और देखभाल पर हर महीने भारी रकम खर्च होती है, जबकि आमदनी के साधन सीमित हैं। ऐसे में अब गोबर से बने उत्पादों के जरिए गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया जा रहा है। गोकाष्ठ और गो-दीप इसके दो बड़े उदाहरण हैं।
गोकाष्ठ क्या है?
गोकाष्ठ गोबर से बनी लकड़ी जैसी छड़ होती है, जिसे मशीन की मदद से तैयार किया जाता है। इसका इस्तेमाल अंतिम संस्कार, हवन और ईंधन के रूप में लकड़ी की जगह किया जा सकता है। इससे पेड़ों की कटाई घटती है और गौशाला को नियमित आमदनी मिलती है। रिपोर्टों के मुताबिक गोकाष्ठ करीब 8 रुपये प्रति किलो तक बिक सकता है।
राजस्थान में मशीन पर 80% अनुदान
राजस्थान सरकार की गोकाष्ठ योजना के तहत पंजीकृत गौशालाओं को गोकाष्ठ मशीन की लागत का 80 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है, बाकी 20 प्रतिशत गौशाला खुद वहन करती है। पात्रता की मुख्य शर्तें:
- गौशाला पंजीकृत हो और कम से कम तीन साल से चल रही हो।
- 200 से ज्यादा गौवंश हों।
- कम से कम 5 बीघा जमीन और थ्री-फेज बिजली कनेक्शन हो।
गो-दीप और दूसरे उत्पाद
त्योहारों के मौसम में गोबर से बने दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, धूपबत्ती और गमले की मांग तेजी से बढ़ी है। कई राज्यों की गौशालाएं दीपावली पर ऐसे उत्पाद बनाकर अच्छी कमाई कर रही हैं। इससे स्थानीय महिलाओं और युवाओं को रोजगार भी मिलता है।
राष्ट्रीय गोकुल मिशन का फोकस
केंद्र सरकार का राष्ट्रीय गोकुल मिशन देशी गौवंश के संरक्षण, नस्ल सुधार और दूध उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित है। इसके तहत कृत्रिम गर्भाधान, उन्नत नस्ल के सांड और गोकुल ग्राम जैसी पहल की जाती हैं। जानकारों का कहना है कि अगर गौशालाएं दूध के साथ गोबर और गोमूत्र आधारित उत्पादों पर ध्यान दें तो वे सरकारी अनुदान पर निर्भरता घटाकर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। गौशाला संचालक अपने जिले के पशुपालन विभाग से योजनाओं की जानकारी ले सकते हैं।